धरती के आँचल में प्राप्त होने वाले आभावान पत्थरों को रत्न कहा जाता हैं. रत्न बड़े प्रभावशाली होते हैं. यदि लग्नेश व् योगकारक ग्रहों के रातों को अनुकूल समय में उचित रीति से जाग्रत कर धारण किया जाएं तो वांछित लाभ प्राप्त किया जा सकता हैं.
विस्तृत विवरणजन्म कुंडली में त्रिकोण सदैव शुभ होता हैं. इसलिए लग्नेश, पंचमेश व् नवमेश का रत्न धारण किया जा सकता हैं. यदि इन तीनों में कोई ग्रह अपनी उच्च राशि या स्वराधि में हो हो रत्न धारण नहीं करना चाहिए. यदि शुभ ग्रह अस्त या निर्बल हो तो उसका रत्न पहने, ताकि उस ग्रह के प्रभाव
विस्तृत विवरणसही रत्न का चुनाव करना एक कठिन कार्य है, क्योंकि रत्न जहां लाभ करते हैं. वहीँ हानि भी पहुंचा सकते हैं. लग्न, चतुर्थ, पंचम, नवम, दशम, द्वितीय ये शुभ भाव हैं. यदि इनसे सम्बंधित ग्रह जन्मकुंडली में स्वग्रही
विस्तृत विवरणरत्न एवं रत्नों से निर्मित आभूषण न केवल शरीर के विभिन्न अवयवों का अलंकरण ही करते हैं वरन उनमें आश्चर्यजनक अलौकिक दैवीय शक्ति विद्यमान रहती है जो अप्रत्यक्ष रूप से मानव शरीर में प्रवेश करके मानव जीवन को निरोगी एवं सुखमय बनाने की सामर्थ्य रखती हैं.
विस्तृत विवरणहरे रंग की प्राकृतिक आभा से युक्त पत्थर पन्ना, संस्कृत मने हरित्मानी, मरकत पाची, गरुत्मत सोपर्नी आदि नामों से भी संबोधित किया जाता हैं. अत: अपनी गुण- विशेषी विशिष्टताओं व सुन्दर स्वरूपों के फलस्वरूप सदियों से
विस्तृत विवरणयह बैंगनी, नीला और श्वेत आदि रंगों में पाया जाने वाला पारदर्शी, नरम, और चमकदार रत्न हैं. मगर यह जितने गहरे बैंगनी रंग का होगा, वह उतना ही अच्छा होता हैं. इसकी खाने ब्राजील, अफ्रीका और भारत में हैं. मगर यह ब्राजील का उतम माना जाता हैं.
विस्तृत विवरणप्राय: मध्य भारत एवं दक्षिण भारत में पाया जाने वाला करंज का सदाबहार विशाल वृक्ष १० से ३० मीटर ऊंचा तथा डेढ़ से ढाई मीटर मोटे तने वाला होता हैं. इसकी छाल हल्का सा पीलापन लिए तथा पत्तियों टहनियों पर १०-१८ सेमी. लम्बी सींकों पर लगी
विस्तृत विवरणरत्न भी पत्थर की तरह एक यौगिक हैं. परन्तु प्रकृति ने रत्नों को विशेष गुणों से संपन्न कर मूल्यवान बना दिया. अन्य पत्थर जहां कालांतर में मलिन और भग्न हो जाते हैं वहीँ रत्न अपने चिरयौवन से शताब्दियों शताब्दियों तक देदीप्यमान रहते हैं.
विस्तृत विवरणअग्नि पुराण की कथा के अनुसार वृत्रासुर ने देव लोक पर आक्रमण किया तब भगवान् विष्णु की सलाह पर देवराज इन्द्र ने महर्षि दधिची से दान में प्राप्त उनकी हड्डियों से वज्र नामक अस्त्र का निर्माण किया. वस्तुत: दधीचि की
विस्तृत विवरणहम अपने आस-पास व्यक्तियों को भिन्न-भिन्न रत्न पहने हुए देखते हैं. ये रत्न वास्तव में कार्य कैसे करते है और हमारी जन्मकुंडली में बैठे ग्रहों पर क्या प्रभाव डालते हैं और किस व्यक्ति को कौन से विशेष रत्न धारण करने चाहिए, ये सब बातें अत्यंत महत्वपूर्ण हैं.
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